
Wednesday, April 11, 2012
Thursday, March 29, 2012
ग़ज़ल...
Thursday, March 22, 2012
दिवाना हूँ मुहब्बत..
Friday, March 16, 2012
कुर्बत....
Wednesday, March 7, 2012
होली की शुभकामनाओं के साथ...
Monday, March 5, 2012
कुछ लफ्ज़ हैं सोये यहाँ काले लिबास में

घूँट घूँट.. कर के लो या एक सांस में,
जिंदगी पियो.. कांच के गिलास में.
आँख मूँद कर तुझे महसूस कर लिया,
कोई नहीं था जब हमारे आस पास में.
चादरें कागज़ की हैं, धीरे से उलटना,
कुछ लफ्ज़ हैं सोये यहाँ काले लिबास में,
मुड़ा हुआ मिला है डायरी का जो सफा,
नाम है मेरा भी उसी सफे ख़ास में.
ये हि सोच कर चुराई मूर्ती उसने,
तालाब नहीं सूखते पंछी की प्यास में.
जिंदगी पियो.. कांच के गिलास में.
आँख मूँद कर तुझे महसूस कर लिया,
कोई नहीं था जब हमारे आस पास में.
चादरें कागज़ की हैं, धीरे से उलटना,
कुछ लफ्ज़ हैं सोये यहाँ काले लिबास में,
मुड़ा हुआ मिला है डायरी का जो सफा,
नाम है मेरा भी उसी सफे ख़ास में.
ये हि सोच कर चुराई मूर्ती उसने,
तालाब नहीं सूखते पंछी की प्यास में.
Saturday, February 18, 2012
ये दिल क्या चाहता है.....
Thursday, February 2, 2012
एक लम्बे अंतराल के बाद...एक ग़ज़ल..

डोर रिश्तों की ढीली तो नहीं है,
कोइ दीवार सीली तो नहीं है.
देख लेना कभी जो घर बनाओ,
कहीं बुनियाद गीली तो नहीं है.
ये सूखे पेड़ जैसे हैं मरासिम,
किसी माचिस में तीली तो नहीं है.
ज़ोर डाला तो कागज़ फाड़ देगी,
कलम कुछ तेज़ छीली तो नहीं है.
साथ रिन्दों के बैठे रात भर से,
मगर दो घूँट भी ली तो नहीं है.
पाँव रखने से पहले देख लेना,
डाल ज़्यादा लचीली तो नहीं है.
Saturday, December 31, 2011
नया साल...................
जगेगा रात भर कोई, कोई जी भर के सो लेगा,
वही सूरज उगेगा फिर वही अखबार निकलेगा,
मेरा दावा है बदलेगी नहीं दुनिया ज़रा सी भी,
महज़ तारीख लिखने का ज़रा अंदाज़ बदलेगा.
वही सूरज उगेगा फिर वही अखबार निकलेगा,
मेरा दावा है बदलेगी नहीं दुनिया ज़रा सी भी,
महज़ तारीख लिखने का ज़रा अंदाज़ बदलेगा.
Saturday, December 10, 2011
दिल भी उसका दुकान लगता है....

राह के दरम्यान लगता है,
वक़्त का इम्तहान लगता है.
ग़म, ख़ुशी, खार, फूल सबकुछ हैं,
दिल भी उसका दुकान लगता है.
हौसला हो बलंदियों पे अगर,
पहुँच में आसमान लगता है.
घर से निकला है सर झुका कर वो,
बेटा उसका जवान लगता है.
बोलता है फ़क़त इशारों से,
पंछी वो भी ज़बान रखता है.
वो मुहब्बत करेगा मुझसे भी,
ये सियासी बयान लगता है.
उसकी नाराजगी में घर मुझको,
एक अधूरा मकान लगता है.
वक़्त का इम्तहान लगता है.
ग़म, ख़ुशी, खार, फूल सबकुछ हैं,
दिल भी उसका दुकान लगता है.
हौसला हो बलंदियों पे अगर,
पहुँच में आसमान लगता है.
घर से निकला है सर झुका कर वो,
बेटा उसका जवान लगता है.
बोलता है फ़क़त इशारों से,
पंछी वो भी ज़बान रखता है.
वो मुहब्बत करेगा मुझसे भी,
ये सियासी बयान लगता है.
उसकी नाराजगी में घर मुझको,
एक अधूरा मकान लगता है.
Monday, December 5, 2011
एक नज़्म - कुछ यूँ ही से खयालात...
मैंने कब कोई गीत लिखा, या ग़ज़ल कही है...
कागज़ की थाली में से कुछ
किसकिसाते लफ्ज़ चुने थे,
तुमने वो सब पढ़ डाले तो
गीत हो गया...
मन के अंधे कुंए में झाँका
तुम्हे पुकारा
नाम तुम्हारा गूंजा
तो एक नज़्म ढल गई
रात अँधेरे में जब उठकर
नींद उलझ बैठी पंखे से,
याद तेरी चुपके से आई,
ग़ज़ल कह गई
मैंने कब कोई गीत लिखा, या ग़ज़ल कही है...
कागज़ की थाली में से कुछ
किसकिसाते लफ्ज़ चुने थे,
तुमने वो सब पढ़ डाले तो
गीत हो गया...
मन के अंधे कुंए में झाँका
तुम्हे पुकारा
नाम तुम्हारा गूंजा
तो एक नज़्म ढल गई
रात अँधेरे में जब उठकर
नींद उलझ बैठी पंखे से,
याद तेरी चुपके से आई,
ग़ज़ल कह गई
मैंने कब कोई गीत लिखा, या ग़ज़ल कही है...
Sunday, December 4, 2011

सुनो, इस फूल को खिलना सिखा दो,
एक पल के लिए तुम मुस्कुरा दो.
नयन को नित नया सा जागरण दो,
देह को नेह मुखरित आचरण दो,
अधर पर कंपकपाते शब्द रख कर,
प्रीत को एक झीना आवरण दो.
मुखर हो प्रीत का स्वर, कुछ सुना दो,
एक पल के लिए तुम मुस्कुरा दो....
देह के बंधनों को मत निभाओ,
ह्रदय की धडकनों के पार जाओ,
पथिक हो प्रेम पथ के तुम प्रिये तो,
उदहारण प्रीत का बन कर दिखाओ.
अधर की प्यास से भी दो गुना दो,
एक पल के लिए तुम मुस्कुरा दो.....
नशीले नैन ये उनीदीं पलकें,
नहाई देह, भीगी भीगी अलकें,
नहीं इंसान वो पाषाण होगा,
देख कर भी ना जिसके भाव छलकें.
मुझे झकझोर कर के अब जगा दो,
एक पल के लिए तुम मुस्कुरा दो....
समय के साथ बहना छोड़ दूंगा,
ह्रदय की पीर सहना छोड़ दूंगा,
बनाऊंगा नया आकाश फिर में,
चाँद को चाँद कहना छोड़ दूंगा.
प्रीत का गीत कोई गुनगुना दो,
एक पल के लिए तुम मुस्कुरा दो....
एक पल के लिए तुम मुस्कुरा दो.
नयन को नित नया सा जागरण दो,
देह को नेह मुखरित आचरण दो,
अधर पर कंपकपाते शब्द रख कर,
प्रीत को एक झीना आवरण दो.
मुखर हो प्रीत का स्वर, कुछ सुना दो,
एक पल के लिए तुम मुस्कुरा दो....
देह के बंधनों को मत निभाओ,
ह्रदय की धडकनों के पार जाओ,
पथिक हो प्रेम पथ के तुम प्रिये तो,
उदहारण प्रीत का बन कर दिखाओ.
अधर की प्यास से भी दो गुना दो,
एक पल के लिए तुम मुस्कुरा दो.....
नशीले नैन ये उनीदीं पलकें,
नहाई देह, भीगी भीगी अलकें,
नहीं इंसान वो पाषाण होगा,
देख कर भी ना जिसके भाव छलकें.
मुझे झकझोर कर के अब जगा दो,
एक पल के लिए तुम मुस्कुरा दो....
समय के साथ बहना छोड़ दूंगा,
ह्रदय की पीर सहना छोड़ दूंगा,
बनाऊंगा नया आकाश फिर में,
चाँद को चाँद कहना छोड़ दूंगा.
प्रीत का गीत कोई गुनगुना दो,
एक पल के लिए तुम मुस्कुरा दो....
Wednesday, November 30, 2011
देखिये कौनसे धारे में सफीना होगा...

आखरी जाम समझ कर इसे पीना होगा,
कब ये सोचा था कि इस हाल में जीना होगा.
वो अभी तक भी है नाराज़ मेरी हरकत पे,
मैंने बचपन में खिलौना कभी छीना होगा.
तेज़ बहते हुए धारे हैं जिंदगी में कई,
देखिये कौनसे धारे में सफीना होगा.
अपनी नजदीकियां पहचान में आ जायेंगी,
तेरी खुशबु से महकता मेरा सीना होगा.
जिस तरह आफताब से उधार लेता है,
नूर तेरा भी इसी चाँद ने छीना होगा.
कब ये सोचा था कि इस हाल में जीना होगा.
वो अभी तक भी है नाराज़ मेरी हरकत पे,
मैंने बचपन में खिलौना कभी छीना होगा.
तेज़ बहते हुए धारे हैं जिंदगी में कई,
देखिये कौनसे धारे में सफीना होगा.
अपनी नजदीकियां पहचान में आ जायेंगी,
तेरी खुशबु से महकता मेरा सीना होगा.
जिस तरह आफताब से उधार लेता है,
नूर तेरा भी इसी चाँद ने छीना होगा.
Tuesday, November 15, 2011
दरम्यान अपने हवा भी ना रहे...

आदतों में भी खराबी ना रहे,
औ' कोई शौक़ भी बाकी ना रहे.
यही अंदाज़-ए-ज़िन्दगी रखना,
मौत को शिकवा ज़रा भी ना रहे.
नाम मयखानों का मंदिर कर दो,
कोई साकी औ' शराबी ना रहे.
आज इतना करीब आ जाओ,
दरम्यान अपने हवा भी ना रहे.
इसलिए बन के रहा जोकर भी,
उसके चेहरे पे उदासी ना रहे.
जो भी कहना है अभी कह डालूँ,
बाद में ऐसी खुमारी ना रहे.
तीर मुझपे चलाने वाले सुन,
देख...कोना कोई खाली ना रहे.
औ' कोई शौक़ भी बाकी ना रहे.
यही अंदाज़-ए-ज़िन्दगी रखना,
मौत को शिकवा ज़रा भी ना रहे.
नाम मयखानों का मंदिर कर दो,
कोई साकी औ' शराबी ना रहे.
आज इतना करीब आ जाओ,
दरम्यान अपने हवा भी ना रहे.
इसलिए बन के रहा जोकर भी,
उसके चेहरे पे उदासी ना रहे.
जो भी कहना है अभी कह डालूँ,
बाद में ऐसी खुमारी ना रहे.
तीर मुझपे चलाने वाले सुन,
देख...कोना कोई खाली ना रहे.
Saturday, October 15, 2011
करवा चौथ...
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