Sunday, August 9, 2009

प्यार की खातिर..

हम ज़हर बस तेरी खातिर ही पिया करते हैं,
दर्द का बोझ भी पलकों पे लिया करतें हैं.

न तो दौलत न तो शोहरत की तम्मना है हमें,
हम तो बस प्यार की खातिर ही जिया करतें हैं.

न हमें ज़ख्म की चिंता रही ना काटों की,
हम अपने ज़ख्म भी काँटों से सिया करतें हैं.

जाम पकडा दिया होठों से लगाकर उसने,
बोसे इस तरह लबों पे वो दिया करतें हैं.

यूँ तो उनको भी है कुछ शौक जफा करने का,
हमसे इजहारे वफ़ा ही वो किया करतें हैं.

बारिश

शब्द हंसते हैं बहर गाती है,
जब भी बारिश घुमड़ के आती है.

किस तरह मैं बचाऊँ अब इनको,
हर ग़ज़ल भीग भीग जाती है.

इक बहाना सा मिल गया है उसे,
मुझसे मिलने कहाँ वो आती है.

कैसा दरिया हुआ है बच्चों का,
कश्ती कागज़ की तैर जाती है.

बूँद बारिश की तेरे गालों पे,
क्या कलाबाजियां दिखाती है.

काले बादल के बीच बगुलों की,
एक सफ में बारात जाती है.

होगी बारिश की देखो चिडिया भी,
आज फिर धूल में नहाती है.

बारिशों में ही माँ भी शिवलिंग पर,
बेल की पत्तियां चढाती है.

Wednesday, July 22, 2009

मुझे आराम चाहिए..

सुकून भरे पल का इंतजाम चाहिए,
बहुत थका हुआ हूँ मुझे आराम चाहिए.

कल तक तो जो भी खबर मिली हादसों की थी,
आज कोई खुश दिल पैगाम चाहिए.

हटा लो बोतल हमारे सामने से अब,
बोतल से बहुत पी चुके अब जाम चाहिए.

दीवानी इस कदर वो मेरे प्यार में हुई,
फिर से किसी मीरा को श्याम चाहिए.

कब तक सफ़र करूँगा जिंदगी में मुसलसल,
अब कोई मंजिल कोई मुकाम चाहिए.

दोस्त बेशक हौसला अफजाई करेंगे,
दुश्मनों का भी तो अहतराम चाहिए.

इन हुस्न वालों के दिमाग आसमां पे हैं ,
इन को कोई हमदम नहीं गुलाम चाहिए.

Thursday, July 16, 2009

मेरी पहली ख़ुशी, मेरी पहली लगन.


मेरी पहली ख़ुशी, मेरी पहली लगन.
मैं तो जीता रहा तुझमें हो के मगन.

तेरे चेहरे से मुझको मिले ताजगी,
तेरा श्रृंगार भी है तेरी सादगी,
तुझको देखूं तो मुझको मिले जिंदगी,
तू ही पूजा मेरी तू ही है बंदगी,

मेरे त्यौहार का तू ही पहला शगन
मैं तो जीता रहा तुझ में हो के मगन....


प्रेमिका तू मेरी तू ही अर्धांगिनी,
तू ही साथी मेरा तू ही है संगिनी,
तू ही पूनम के चंदा की है चांदनी,
इतनी पावन के गंगा के जल से बनी,

अंजुरी भर के तेरा करूँ आचमन,
मैं तो जीता रहा तुझमें हो के मगन....


हाँ तुझे जब बनाया था भगवान् ने,
अप्सरा वाली मिटटी ली निर्माण में,
था खुदा ने गढा तुझको रमजान में,
होंठ पे तिल दिया तुझको मुस्कान में,

यूँ हुआ इस धरा पे तेरा अवतरण,
मैं तो जीता रहा तुझमे हो के मगन....

मेरा बेटा...

तेरी मोटर
तो खराब भी पड़ सकती है,
मेरा घोड़ा
तो तीन टांग से भी भागता है,

क्या करोगे
जब बिजली चली जायेगी ?
ये कंप्यूटर तो बंद ही हो जायेगा,

मैं तो अँधेरे में भी
अपना खेल खेल सकता हूँ,
मेरे पास तो पुरानी सांप सीढ़ी है,

क्या कहा...?
तेरे पापा को कार लिए हो गए बरसों,
तो क्या हुआ...
मेरे पापा भी ले आयेंगे शायद....परसों.........

अपने सोये हुए
अरमानों को जिंदा नहीं होने देता,
मेरे बेटा मुझे शर्मिन्दा नहीं होने देता.

एक और ग़ज़ल..

ये गुलिस्तान मेरी पहुँच से बहुत दूर नहीं है,
हाँ मुझे ही फूल चुनने का शऊर नहीं है.

कहीं दौलत का नशा है कहीं जवानी का,
अब ऐसा कौन है जिसपे कोई सुरूर नहीं है,

वो और लोग थे जो वतन पे इतराते थे,
अब तो बच्चों को अपने बाप पे गुरूर नहीं है.

मीठी नींद भी उसे फ़क़त सपनों में आती है,
जो हर शाम को मेहनत से थक के चूर नहीं है.

मेरे हालत किसी को मैं समझाऊं भी कैसे,
मेरी तरह कोई भी तो मजबूर नहीं है.

वो परबत की तरह है उसे झुकना नहीं आता,
तन के ज़रूर खडा है मगरूर नहीं है,

लो आ गयी कश्ती भी तूफां से निकल कर,
हौसला रखो कि मंजिल दूर नहीं है.

इन्सान तो नहीं था वो ?

किसी मासूम की पहचान तो नहीं था वो ?
टूटे दिल का कोई अरमान तो नहीं था वो ?

तुम जला आये उसे, फूंक दिया मुंह ढक के,
देख लेते, कोई इन्सान तो नहीं था वो ?

आइना तोड़ दिया तूने डर के पत्थर से,
तेरा ही अक्स था हैवान तो नहीं था वो.

मेरा घर छोड़ के कुल शहर में बरसा बादल,
वजह रही होगी, बेईमान तो नहीं था वो.

कल एक ख़त लिए फिरता था अदू गलियों में,
मेरे ही कत्ल का फरमान तो नहीं था वो ?

Saturday, June 27, 2009

कई किश्तों में मरता है.

सुहानी शाम के मंज़र में जब ये दिल धड़कता है,
मेरे अन्दर कोई शायर कई किश्तों में मरता है।

कोई आएगा शायद आज दरवाजा खुला रखूं,
पुराने नीम की डाली पे इक पंछी चहकता है।

ये सारे शेर सारी शायरी बेकार लगती है,
किसी बच्चे की आंखों से अगर आंसू छलकता है।

करूँ फिर कोई जिद रुठुं मैं रोऊँ और चिल्लाऊं,
बच्चों की जिदों से ही तो माँ का मन बहलता है।

तू ही तुलसी मेरे घर की, है तू ही रात की रानी,
तेरे आँचल की खुशबू से मेरा आँगन महकता है।

कई दिन बाद मिल कर भी उनींदे से ही लगते हो,
कहाँ अब मुझसे मिलने को तुम्हारा दिल मचलता है।

इश्तहार हूँ....

ग़म मुझसे बाँट लो तुम्हारा ग़म गुसार हूँ,
जो उम्र भर ना चुक सके ऐसा उधार हूँ।
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तुम देख भी लो मुझको मगर भूल भी जाओ,
सड़क पे लगा हुआ कोई इश्तहार हूँ।
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नशा अगर करो तो मेरे प्यार प्यार का करो,
तुम ख़ुद को भूल जाओगे ऐसा खुमार हूँ।
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अपनी ही उम्र खर्च कर रहा हूँ मुसलसल,
अपने ही दुश्मनों में आज मैं शुमार हूँ।

Sunday, June 14, 2009

सुहागरात..




नए सिरे से जिंदगी की शुरुवात करें,आज की रात को फिर से सुहाग रात करें।
हटाओ तुम भी ये चिलमन कि चाँद दिखने दो,

हमारा साथ निभाओ कि जवां रात करें।
बढ़ाओ हाथ ज़रा रौशनी को को गुल कर दो,हमारे होंठ तुम्हारे लबों से बात करें
अपने होठों के प्याले से यूँ पिलादो हमें,कोई जवाब दे सकें ना सवालात करें.

Saturday, June 13, 2009

हाशिया नहीं मिलता.

प्यार का इन दिनों कोई वाकया नहीं मिलता,
शेर कहने के लिए काफिया नहीं मिलता।


जिंदगी भर चुकी है नफरतों के रंगों से,
किसी सफे पे कोई हाशिया नहीं मिलता।


जो सिर्फ़ प्यार-ओ-मोहब्बत की इल्तिजा लाये,
आजकल शहर मैं वो डाकिया नहीं मिलता।



इश्क इक लाईलाज मर्ज़ हुआ करता है,
इसका कोई इलाज़ शर्तिया नहीं मिलता।


शेखजी बन गए सब पीने वाले क्या करते,
कभी मैखाना कभी साकिया नहीं मिलता।

Wednesday, June 10, 2009

ग़ज़ल

इन दिनों मुझे जीवन किसी सज़ा सा लगता है,
तेरे बगैर ये बिस्तर बड़ा बड़ा सा लगता है।

एक मदहोशी सी रहती है तेरी कुर्बत में,
तेरे बदन की महक में कोई नशा सा लगता है।

ये तेरी बोलती आँखें ये लरज़ते हुए लब,
तेरा चेहरा मुझे ज़न्नत की अप्सरा सा लगता है।

मैं तेरी याद में रोया नहीं कभी फ़िर भी,
सुबह के वक्त जाने क्यूँ गला भरा सा लगता है।

पन्ने उलटता रहता हूँ यूँ ही किताब के,
जिंदगी का हर सफा पढ़ा सुना सा लगता है।

मसाइल और भी हैं प्यार के सिवाय मगर,
सावन के इस अंधे को सब हरा सा लगता है।

अपनी हर साँस पे अब तेरा नाम लिख दिया मैंने,
मगर तुझे ना जाने क्यूँ ये सब ज़रा सा लगता है।

एक ग़ज़ल

बेताब परिंदों की चहक देख रहा हूँ,
आसमां छूने की कसक देख रहा हूँ।


कहने को अभी तक हैं मेरे पाँव ज़मीं पे,
लेकिन उठा के सर को फलक देख रहा हूँ।


दीवानगी या इश्क का असर कहो इसे,
रंग सूंघता हूँ महक देख रहा हूँ।


वो बुत समझ रहे हैं मुझे उनको क्या पता,
आगाज़ से अंजाम तलक देख रहा हूँ।


कौनसी मंजिल है मेरी रास्ता है क्या,
चौराहे पे खडा हूँ सड़क देख रहा हूँ।

Monday, June 8, 2009

कुछ यूँ ही से खयालात...!!!

कनारा आँख का कुछ नम तो हुआ ही होगा,
वो कहे या न कहे गम तो हुआ ही होगा.
अपनी औलाद की मासूम सी ख्वाहिश के लिए,
गरीब बाप का सर ख़म तो हुआ ही होगा.
ज़र्द सूखे हुए पत्तों से भर गयी है सड़क,
बोझ पेडों का भी कुछ कम तो हुआ ही होगा
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उनकी जफा पे बददुआ तो हम भी रखते हैं,
कह नहीं पाते जबां तो हम भी रखते हैं.
आप कीजिये सितम हम मुस्कुराते जायेंगे,
ये निराली सी अदा तो हम भी रखते हैं.
देखना सैलाब हम को छू ना पायेगा,
साथ में माँ की दुआ तो हम भी रखते हैं

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हसीं मंज़र नज़र आता है इन पुरवाइयों के बीच,
जवां है रात हम दोनों हैं इन तनहाइयों के बीच,
मैं सोना चाहता हूँ रख के सर को तेरे सीने पे,
किसी मंदिर के गुम्बद सी तेरी ऊँचाइयों के बीच

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पढ़ के किताबें हम ने कभी कुछ नहीं सीखा,
मोहब्बत ने सिखाया हमें जीने का सलीका.
ऐ चाँद तुझे चौदवहें कि रात देख कर,
कहने लगा हूँ मैं भी उसे चाँद जमीं का।

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ये गुलिस्तान मेरी पहुँच से बहुत दूर नहीं है,
ख़ुद मुझे ही फूल चुनने का शऊर नहीं है।
मेरे हालात किसी को समझ आयें भी तो कैसे,
मेरी तरह कोई भी तो मजबूर नहीं है।
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एक इल्तिजा....

साथ में रहो ना मेरे बिन रहा करो,
छोड़ कर मुझे न बहुत दिन रहा करो।


मुझको तुम्हारी याद सताएगी रात दिन,
तुम दूर ना मुझसे कोई पलछिन रहा करो।

करने दो अपने साथ जो दुनिया करे जफा,
तुम मेरी वफ़ा पे तो मुत्मुइन रहा करो।

मैं तुम को एक घर ना दे सका अभी तलक,

मेरे हसीन दिल की मालकिन रहा करो।