बादल भी थे हवा भी, बिजली भी थी घटा भी,
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काली घटा से आसमान काला हो चला था,
दिन में भी रात जैसा अँधियारा हो चला था,
सड़क पे बरसात की बूंदें मचल रहीं थीं,
बच्चों की टोलियाँ भी पानी में चल रहीं थीं,
पीने के इरादे से कुछ मन बहक रहे थे,
पेड़ों पे नई धुन में पंछी चहक रहे थे,
कोयल भी कहीं छुप कर कोई गीत गा रही थी,
कहीं दूर पपीहे की आवाज आ रही थी,
जश्न का आलम था रंगीन फिजायें थीं,
आसमां पे छाई हुई काली घटायें थीं,
मिटटी की सौंधी सौंधी खुश्बू महक रही थी,
कांच की मानिंद ही सड़क चमक रही थी,
उस सड़क के किनारे फुटपाथ सा बना था,
पानी भरा हुआ था और मिटटी से सना था,
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उस ओर अचानक जो नज़र गई हमारी,
सिकुड़ा हुआ नंगे बदन बैठा था इक भिखारी,
बेजान बुत की तरह वो बैठा था ज़मीं पे,
चिंता की लकीरें थीं भीगी हुई जबीं पे,
पानी में भीग भीग कर चमडी पिघल रही थी,
उसकी जटाओं से भी गंगा निकल रही थी,
चेहरा बुझा बुझा था आँखें थीं खोई खोई,
लगता था जैसे आँख ये बरसों से नहीं सोई,
मैंने भी ज़रा रुक कर कुछ तरस उस पे खाया,
हाथ जेब में गया और कलदार ढूंड लाया,
कलदार एक लेकर मैंने उस तरफ बढाया,
उसने भी झोली खोली फिर हाथ भी बढाया,
कलदार उसको दे कर मैं आगे बढ़ गया था,
बरसात पे श्रृंगार का इक गीत गढ़ गया था,
बरसात की रंगीनियों में फिर मैं खो गया था,
दो एक जाम पी कर बिस्तर पे सो गया था,
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सुबह फिर अखबार था खबरों का सिलसिला था,
सड़क के किनारे एक भिखारी मरा मिला था.......
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कोई समझा है ना समझेगा ये कुदरत क्या है,
मुझे बताओ ऐसी "बारिश" की ज़रुरत क्या है.