ज़िक्र होता नहीं जवानों में, लोग गिनने लगे सयानों में. होगा अपना भी खरीदार कोई, सज गए हम भी अब दुकानों में. वो मोहब्बत नहीं मिलेगी कहीं, जो मोहब्बत है माँ के तानों में. एक कमरे का घर तो बेच दिया, कई कमरे हैं अब मकानों में. इश्क का कारोबार चल निकला, प्यार बनता है कारखानों में. ज़िक्र दुश्मन का कर रहे हो तुम, नाम मेरा भी है बयानों में. फिर बहाना करो ना आने का, इश्क जिंदा है बस बहानों में. पंछियों ने इन्हें छुआ भी नहीं, तेरी खुशबु कहाँ थी दानों में.
ये बड़ी अजीब सी बात है, यूँ जुदा है तू कि तू साथ है.
दिन तेरी याद से तर-ब-तर, और सूखी रेत सी रात है.
ये लकीर हो ना हो हाथ में, मेरे हाथ में तेरा हाथ है.
अभी देखिये होता है क्या, अभी इश्क कि शुरुवात है.
ए चाँद तू भी तो देखना, वो जो मेरी जाने हयात है.
तुझे भीगना ही पड़ेगा अब, मेरे प्यार कि बरसात है.
हमने हालात दीगर मांगे थे, मगर ऐसे भी किधर मांगे थे. हौसला मांग रहे थे खाली, पाँव मांगे थे, न पर मांगे थे. तुमने साहिल पे लाके छोड़ दिया, हमने तूफ़ान-ओ-लहर मांगे थे. रोज़ मंदिर नए बनाते हो, कुछ गरीबों ने भी घर मांगे थे. हमें तन्हाई के दिन रात मिले, वस्ल के शाम-ओ-सहर मांगे थे. आपने जोड़ दिए आगे से, हमने पीछे से सिफ़र मांगे थे